Friday, 21 September 2018

*ନର୍ମଦାଷ୍ଟକମ୍*

नर्मदाष्टकम् 

सबिन्दुसिन्धुसुस्खलत् तरङ्ग भङ्गरञ्जितं द्विषत्सुपापजातजातकारिवारिसंयुतम् । 

कृतान्तदूत कालभूत भीतिहारि वर्मदे 
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥ १ ॥ 

त्वदम्बुलीन दीन मीन दिव्य सम्प्रदायकं 
कलौमलौघ भारहारि सर्वतीर्थनायकम् । 

सुमत्स्यकच्छ नक्रचक्र चक्रवाक शर्मदे 
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥ २ ॥ 

महागभीर नीरपूर पापधूत भूतलं 
ध्वनत्ससमस्त पातकारि दारितापदाचलम् । 

जगल्लये महाभये मृकण्डुसुनूहर्म्यदे 
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥ ३ ॥ 

गतं तदैव मे भयं त्वदम्बु वीक्षितं यदा 
मृकण्डुसूनुशौनका सुरारिसेविसर्वदा । 

पुनर्भवाब्धि जन्मजंभवाब्धि दुःखवर्मदे 
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥ ४ ॥ 

अलक्षलक्ष किन्नरामरासुरादिपूजितं 
सुलक्षनीर तीरधीर पक्षिलक्षकूजितम् । 

वसिष्ठसिष्ट पिप्पलादि कर्दमादिशर्मदे 
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥ ५ ॥ 

सनत्कुमार नाचिकेत कश्यपादिषट्पदैः 
धृतं स्वकीयमानसेषु नारदादिषट्पदैः । 

रवीन्दुरन्तिदेवदेवराजकर्मशर्मदे 
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥ ६ ॥ 

अलक्षलक्ष लक्षपापलक्ष सायरसायुधं 
ततस्तु जीवजन्तुतन्तु भुक्तिमुक्तिदायकम् । 

विरश्र्चिविष्णुशङ्कर स्वकीय धामवर्मदे 
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥ ७ ॥ 

अहोऽमृतं स्वनं श्रुतं महेशकेशजातटे 
किरातसूतवाडवेषु पण्डिते शठे नटे । 

दुरन्तपापतापहारि सर्वजन्तुशर्मदे 
त्वदीयपादपङ्कजं नमामि देवि नर्मदे ॥ ८ ॥ 

इदं तु नर्मदाष्टकं त्रिकालमेव ये सदा 
पठन्ति ते निरन्तरं न यान्ति दुर्गतिं कदा । 

सुलभ्य देहदुर्लभं महेंशधाम गौरवम् 
पुनर्भवा न वै नरा विलोकयन्ति रौरवम् ॥ ९ ॥ 

॥ इति श्रीमत् आद्यशङ्कराचार्यविरचितं 

नर्मदाष्टकं सम्पूर्णम् ॥ 

୨୧. ୯. ୧୮

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